बिहार में बाढ़ या बहार ?किस बात का बहार

हर साल सर्दी, बसंत बहार, गर्मी की तरह ये बाढ़ भी एक आपदा के बजाय मौसम की तरह हो गया है ।
नही नही नही रुकिए …
ये आपदा तो है ही भीषण आपदा ।। लेकिन यह मौसम भी है , गर्मी सर्दी की तरह नही बसंत बहार की तरह । लेकिन इस आपदा मे सब कुछ गंवाने वालो के लिए ये “बहार” नही है नेताओ मंत्रीयो के लिए बहार है अधिकारियो के लिए बहार है । घोटाले बाजो के लिए बहार है ।
हर साल इन दोनो राज्यो मे खरबों रूपये का नुकशान करने वाला ये बाढ़ कुछ नेताओ मंत्रियो व अधिकारियों को करोड़ो का फायदा भी कर जाता है । ठेकेदारो को ठेके पर काम भी मिल जाता है और बाढ़ मे बरबाद हुए कुछेक को काम भी मिल जाता है ।
क्या हमने इस बाढ़ को गंभीरता से लिया है ? यह सवाल मै सिर्फ सत्ता मे बैठने वालो से नही पूछ रहा । ये सवाल उनसे भी है जो खुद को जिम्मदार नागरिक समझते है और नुक्कड़ो पर ज्ञान का बवंडर छोड़ते रहते है । यह सवाल उनके लिए भी है जो सोशल मीडिया मे युद्ध लड़ते है और बड़े सोशल वर्कर बने हुए है । और अंततः यह सवाल उनसे भी जो स्वंय बाढ़ की चपेट मे आ कर सब कुछ गंवा बैठते है या फिर बाढ़ की निर्दयता को झेल चुके है ।
क्या हमने इस बाढ़ को हमने अपना मुकद्दर का हिस्सा मान लिया है ?
यकीनन हमने मान लिया है । क्योंकि इस मौसमी आपदा के गुजर जाने के बाद हम पुनः असंवेदनशील हो जाते है ऐसे व्यवहार करते है जैसे कुछ हुआ ही नही । सिर्फ असम मे हर साल तकरीबन 40 लाख लोग बाढ़ की चपेट मे आकर सैकड़ो जाने गंवा बैठते है । बिहार का भी लगभग यही हाल रहता है ।
तब ही तो महानन्दा बेसिन परियोजना पर 1978से अब तक काम नहीं हुआ
सरकारे इस दिशा मे कुछ राहत कार्य कर, जनता के खातो मे कुछ रकम डाल कर यह समझ बैठती है कि हमने अपनी जिम्मेदारी को खूब निभाया है ।
क्यों सरकारे इन भीषण बाढ़ का कोई स्थाई समाधान निकालने को लेकर गंभीर नही है क्यों ? क्या राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी का दंश बाढ़ पीड़ितो को हर साल झेलना ही पड़ेगा ?
इस तरह तो बाढ़ ग्रस्त इलाके व यहां बसने वाले लोगो के लिए विकास व समृद्धि तो न पूरा होना वाला एक सपना बन कर रह जाएगा । और बाढ़ पीड़ित व उनका आशियाना हर साल डूबता रहेगा बर्बाद होता रहेगा ।

नही अब बस अब और नही । बाढ़ पीड़ीतो अब आपको ही कदम उठाने होंगे अवाज उठाने होंगे । सत्ता मे बैठे इन नेताओ व अधिकारियो के कान के पर्दे फाड़ने होंगे । विरोध करने होंगे आंदोलन छेड़ने होंगे ।
या तो सत्तासीन नेता अपने सोंच बदलेंगे, हालात बदलेंगे या फिर जनता अपने व्यवहार बदलेंगे, नेता बदलेंगे ।
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