आखिर क्यों आजतक महबूब आलम कच्चे मकान में रह रहे हैं!

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बिहार विधानसभा चुनाव में कटिहार जिले की बलरामपुर विधानसभा सीट से CPI-ML के उम्मीदवार महबूब आलम ने चौथी बार जीत दर्ज की है.

 

सोशल मीडिया पर महबूब आलम और उनके घर की तस्वीर खूब वायरल हो रही है और 4 बार विधायक रह चुके महबूब आलम के पास अब तक पक्का मकान नहीं होने की प्रशंसा की जा रही है जिसे लेफ्ट विचारधारा से जुड़े पत्रकार, समाजसेवी वगैरह ज़्यादा प्रचारित कर रहे हैं.

 

सादगी अच्छी बात है मागर एक सवाल है वामपंथी मित्रों से कि चार बार विधायक रहे एक व्यक्ति के पास उसका अपना मकान क्यों नहीं है जबकि मकान व्यक्ति की बुनियादी ज़रूरत है.

 

मुझे ये सब शोषण का नया स्वरूप लगता है कि वामपंथ की गोद में मुसलमान 4 बार विधायक भी हो जाए फिर भी उसका अपना अच्छा मकान नहीं हो सकता. भाजपा तो मुसलमानों को राजनीति से दूर रखती ही है जिससे मुसलमान सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़ जाता है मगर वामपंथी, मुसलमान को सत्ता में भागीदारी देकर भी उसे भूखा और दयनीय बनाए रखते हैं. कौन ज़ालिम है आप तुलना कर सकते हैं.

 

ज़ुल्म तो ये है कि महबूब आलम के कच्चे मकान की तारीफ लुटियंस दिल्ली के आलीशान बंगलों में बैठे कॉमरेड भी कर रहे हैं. महबूब आलम के कच्चे मकान की तस्वीर दिखाकर मुसलमानों में अपनी पकड़ मज़बूत बनाने की कोशिश करने वालों से सवाल तो होना ही चाहिए कि ये कैसा शोषण.

 

वामपंथी मित्रों, अपनी विचारधारा के प्रति लोगों को आकर्षित करने के लिए महबूब आलम का ही मकान क्यों दिखाया जा रहा है? सीताराम येचुरी की मकान भी दिखाते, प्रकाश कारात, वृंदा, सुभासिनी की मकान भी दिखाते तो अच्छा लगता. उनके बच्चे कहाँ पढ़ते हैं इसकी भी डिटेल्स देते. महबूब आलम के बच्चे और लुटियंस दिल्ली के कॉमरेड के बच्चे कहाँ पढ़ते हैं इसकी भी तुलना करते तो कुछ बात बनती.

 

ज़ुल्म की इंतेहा देखिए कि महबूब आलम की पत्नी अपने कच्चे मकान में बच्चों के साथ ख़ुश होने की बात कर रही हैं, ऐ आर रहमान की लड़की के हिजाब करने पर ‘कंडीशनिंग’ को लेकर सवाल करने वाली पत्रकार आरिफा ख़ानम शेरवानी से कोई ज़रा पूछे कि आख़िर वामपंथियों ने इन औरतों और बच्चों की कैसी “कंडीशनिंग” की है जो अपनी बुनियादी जरूरतों से विमुख हो गए हैं?

 

भाजपा सत्ता से दूर रख कर मुसलमानों को दयनीय बनाती है और वामपंथ सत्ता देखर मुसलमानों को दयनीय बना देता है. और जब मुसलमान किसी मुस्लिम पार्टी की तरफ रुख करता है तो उसे साम्प्रदायिक बना देता है. महबूब आलम का कच्चा मकान देखकर अहमद फ़राज़ से माफी के साथ मैं तो बस यही कहूंगा कि:

 

इन वामपंथियों से दोस्ती अच्छी नहीं महबूब,

कच्चा तेरा मकान है कुछ तो ख़याल कर…!

 

-मसीहुज़्ज़मा अंसारी

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