ममता बनर्जी के बंगाल चुनाव जीतने का 5 बड़े कारण क्या हैं ?

बंगाल चुनाव के नतीजे आने के बाद अब लोग बेहद अचंभे में हैं सीटों का आंकड़ा 200 के ऊपर चला जाएगा, इसकी उम्मीद तृणमूल के घोर समर्थक को भी नहीं रही होगी। ख़ुद ममता बनर्जी ने भी दो-तिहाई सीटें जीतने का दावा किया था – यह संख्या भी 200 से कम ही बैठती है।

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को जैसी जीत मिली, उसकी कल्पना तो खुद ममता बनर्जी ने नहीं की थी। उनकी इस शानदार जीत में बीजेपी का 5 बड़ा योगदान।

एजेंसियों का इस्तेमाल: केंद्र की बीजेपी सरकार ने ममता और तृणमूल कांग्रेस को कमज़ोर करने के लिए अपनी हर एजेंसी का इस्तेमाल किया, चाहे वह प्रवर्तन निदेशालय हो या सीबीआई। यहां तक कि चुनाव आयोग के आदेश भी बीजेपी की इच्छा के अनुकूल ही आते रहे। इससे राज्य के लोगों के सामने यह संदेश गया कि बीजेपी शुद्ध राजनीतिक तरीक़ों से नहीं, अनैतिक तरीक़ों से यह युद्ध जीतना चाहती है। हद तो तब हो गई जब अभिषेक बनर्जी की पत्नी तक को लपेटने की कोशिश की गई। इन सबका उलटा नतीजा निकला।

दलबदलुओं का सहारा: बीजेपी पश्चिम बंगाल में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए पिछले कुछ सालों से तृणमूल कांग्रेस के उन नेताओं को अपने पाले में ले रही थी, जिन पर घोटालों के आरोप थे या जिनकी अपनी पार्टी में पूछ कम हो गई थी। ऐसे लोगों को जब पार्टी में शामिल किया गया तो एक तरफ़ तो पार्टी के पुराने और समर्पित सदस्यों में रोष फैला, दूसरी तरफ़ आम जनता में भी यह संदेश गया कि बीजेपी का चरित्र दूसरी पार्टी से अलग नहीं है। यही कारण रहा कि इक्का-दुक्का को छोड़कर अधिकतर दलबदलू नेताओं को इस चुनाव में हार का सामना करना पड़ा।

ध्रुवीकरण की कोशिश: बीजेपी के नेता पहले दिन से ममता बनर्जी और उनकी पार्टी को मुस्लिमपरस्त घोषित करने में लगे हुए थे, जबकि उनके पास इस आरोप को सिद्ध करने के लिए कोई सबूत नहीं था। पार्टी का हर नेता अपने भाषणों में तुष्टीकरण का जाप करता था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो आसनसोल में कुछ साल पुराने दंगों का ज़िक्र कर पुराने घावों को कुरेदने की भी कोशिश की। उधर नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी ममता को बेगम कहकर और चुनावी लड़ाई को 70 बनाम 30 बताकर इसे हिंदू बनाम मुस्लिम संग्राम बनाने में जुट गए थे। अंततः इन सभी कोशिशों से बीजेपी को लाभ कम, नुक़सान अधिक हुआ। नुक़सान इसलिए कि हिंदू वोटरों में उसकी पैठ तो नहीं बढ़ी लेकिन मुस्लिम वोटर जो पहले कांग्रेस या वाम दलों को भी कुछ वोट देता था, उसने इस बार एकमुश्त तृणमूल कांग्रेस को वोट दे दिया। परिणति वही हुई – चौबेजी छब्बेजी बनने चले, दुबेजी बनकर रह गए।

कोरोना पर स्टैंड: जब बाक़ी देश की तरह बंगाल में भी कोविड के मामले बढ़ने लगे तो ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग से आग्रह किया कि वह बाक़ी के तीन चरण एकसाथ करवा दे। बीजेपी भी इसी तरह की अपील कर सकती थी। लेकिन विरोधी की हर बात को काटने की नीति के चलते बीजेपी ने इसका समर्थन नहीं किया। इसका उसे भारी ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा क्योंकि इससे इन शेष तीन चरणों के मतदाताओं में यह संदेश गया कि तृणमूल को तो हमारी जान की चिंता है, लेकिन बीजेपी को नहीं। बीजेपी को यह चाल भी उलटी पड़ी।

 

निजी हमले: बीजेपी के नेताओं ने राज्य में व्याप्त भ्रष्टाचार और रोज़गार की कमी का मुद्दा तो उठाया, लेकिन उनका ज़्यादा समय ममता बनर्जी और उनके भतीजे पर निजी हमले करने में बीता। मीडिया ने भी टीआरपी के चक्कर में उन्हीं टिप्पणियों को हाइलाइट किया, जिसमें सबसे प्रमुख था मोदी का ‘दीदी ओ दीदी’ कहना। उधर बंगाल बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष ने उनकी चोटिल टांग को लेकर इतनी भद्दी टिप्पणी की, जिससे ममता की नीतियों को नापसंद करने वाला भी ग़ुस्से से भर उठा। हमने अतीत में भी देखा है कि किसी लोकप्रिय नेता पर निजी हमले करने का उलटा असर होता है। गुजरात में इसका लाभ नरेंद्र मोदी को मिला तो दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को। इसके अलावा वंशवाद भारतीय राजनीति में कोई गुनाह नहीं माना जाता। हर पार्टी में नेताओं के बेटे और रिश्तेदार सक्रिय रहते हैं, लेकिन इसके कारण उनको कोई हानि नहीं होती। इसलिए अभिषेक बनर्जी पर हमलों का भी कोई असर नहीं हुआ

 2,244 total views,  4 views today