मुस्लिम देश शोषित फिलिस्तीनीयो की मदद क्यों नहीं किया ?

एक वक़्त था जब जामा मस्ज़िद के शाही इमाम सरकारी उड़न खटोले पर बैठ कर ऐलान करते थे फलाने पार्टी को वोट दें। लोग एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देते थे। उनकी बातों का कोई असर नही था। लोग उनका सिर्फ एहतराम करते थे वो भी इसलिए की मुग़ल सल्तनत के शाही इमाम के वंशज थे।

बस यही हाल OIC का है, इस 57 मुस्लिम देश के ग्रुप का मुखिया सऊदी अरब है। इनके भी बयान से किसी देश को कोई फ़र्क़ नही पड़ता। जिस मस्ज़िद अक़्सा की हिफाज़त के लिए 1969 में OIC बनाया गया वो मसला आज तक ये सुलझा नही पाए, अब जिस हालत में मस्ज़िद ए अक़्सा पहुच चुकी है वो आपके सामने है।

क़ौम ने ऐसे हुक्मरानों से उम्मीद लगा रखी है जो खुद दूसरों के भरोसे हैं।

सिर्फ ईरान खुल के फिलिस्तीन लड़ाकों का समर्थन करता है हथियार भी सप्लाइ करता है। लेकिन वो खुद अपने सेना प्रमुख क़ासिम सुलेमानी को इजरायल अमेरिका हमले से बचा नही पाया। पिछले साल एक हमले में उनकी मौत हो गयी थी। मौत की वजह थी हमास लड़ाकों को सपोर्ट करना।

इजराइल के हाथों कई जंग हारने के बाद जॉर्डन, इजिप्ट, लेबनान, के अंदर अब जंग की क़ूवत नही बची।

पाकिस्तान को ज़्यादातर लेटेस्ट हथियार अमेरिका ने दिये जिसे वो बिना परमिशन के इस्तेमाल नही कर सकता। इकोनॉमि खस्ताहाल है, इसे देश से भी बड़े बड़े बयानबाज़ी के अलावा कुछ नही मिलता फिलिस्तीनियो को।

तुर्की ज़्यादातर हथियार इज़राइल और अमेरिका से खरीदता है। तुर्की इज़राइल के बीच 7.2 बिलियन का हथियार व्यापार है। तुर्की के एरदोगन और मोदी में कोई फ़र्क़ नही है। सिर्फ बयानबाजी दिखावे की है। जो मस्ज़िद ए अक़्सा पर हमले के बाद अपने देश में इज़राइल दुतावास नही हटा सका, उससे जंग की क्या उम्मीद।

सऊदी की अपनी फौज तक नही है, हिफाज़त का ज़िम्मा अमेरिकन फ़ोर्स के पास है। और अमेरिका इज़राइल के पीछे पूरी ताक़त के साथ खड़ा है। तो अब भी किसी को लगता है IOC जंग में फिलिस्तीन का साथ देगा तो वो धोखे में है।

ये हुक्मरान क़ौम को अपने पैरों पर खड़ा नही कर सकत है। हां वो अलग बात है, जंग में बर्बाद हए मज़लूमों को अपनी बेशुमार दौलत से आटा दाल पहुचाते रहेंगे।

फ़िलिस्तीनियों को, मस्ज़िद ए अक़्सा को अब बस किसी सलाउद्दीन अय्यूबी का इंतेज़ार रहेगा…अल्लाह सब की हिफाज़त फरमाये… दुनिया भर में अमन-चैन कायम रहे।

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